Friday, October 12, 2018

ब्लॉग: रफ़ाल पर मोदी-अंबानी और दोतरफ़ा नौटंकी में उलझे पांच सवाल

क शब्द है जवाबदेही, जिसे गुजरात का होने की वजह से मोदी अक्सर 'जवाबदारी' कहते हैं. इसी का एक पर्यायवाची शब्द उत्तरदायित्व भी है.
आसान भाषा में इसका मतलब यह होता है कि जवाब देने का काम किसका है?
रफ़ाल सौदा और उसमें अनिल अंबानी की नई-नवेली कंपनी की भूमिका को लेकर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं जिनकी सीधी 'जवाबदारी' नरेंद्र मोदी की है क्योंकि वे प्रधानमंत्री हैं और इस सौदे पर उन्होंने दस्तख़त किए हैं. साथ ही, इस डील को अंजाम तक पहुंचाने में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर या कैबिनेट की किसी भूमिका के कोई सुराग नहीं हैं.
यही वजह है कि सवाल पीएम मोदी से पूछे जा रहे हैं, लेकिन जवाब उनकी टीम के सदस्य दे रहे हैं, सवालों की शक्ल में या फिर फिकरे कसकर.
पीएम ने मध्य प्रदेश में राहुल गांधी के आरोपों को विदेशी साज़िश करार दिया, लेकिन जवाब तो दूर, रफ़ाल शब्द उनके मुंह से नहीं निकला. यह फिकरा ज़रूर निकला, "जितना कीचड़ उछालेंगे उतना कमल खिलेगा."
यह कहने का कोई आधार या सबूत नहीं है कि कोई घोटाला हुआ है या किसी ने रिश्वत ली है, लेकिन यह पूरा मामला राजीव गांधी के कार्यकाल के बोफ़ोर्स घोटाले की तरह परत-दर-परत खुल रहा है.
बोफ़ोर्स मामले में भी यह साबित नहीं हो सका कि वह घोटाला था या राहुल गांधी के पिता ने रिश्वत ली थी.
'चोर' और 'ख़ानदानी चोर' के हो-हल्ले के बीच, न तो सही सवाल सुनाई दे रहे हैं, न ही कोई जवाब मिल रहा है. वाल भारत के राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा, प्रधानमंत्री के दफ़्तर की गरिमा और पारदर्शिता से जुड़े हैं. मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट के दो मंत्रियों और एक नामी वकील ने इसे 'घोर आपराधिक अनियमितता' बताते हुए, कई सवाल सवाल पूछे हैं.
ऐसे ही सवाल 1980 के दशक में राजीव गांधी से पूछे जा रहे थे, तब उनकी जो प्रतिक्रिया थी, वह बीजेपी के आज के रवैए से बहुत अलग नहीं है.
जैसे व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्ट होने के आरोप नरेंद्र मोदी पर नहीं लगे हैं, एक ज़माने में राजीव गांधी को 'मिस्टर क्लीन' कहा जाता था. सबसे पहली प्रतिक्रिया तो यही थी कि गंगा जैसी पवित्र छवि वाले नेता पर ऐसे आरोप लगाने की हिम्मत कैसे हुई?
जिन लोगों की उम्र 45 से ऊपर है, उन्हें शायद याद होगा कि राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव में बोफ़ोर्स सौदे पर सवाल उठाने वालों को 'विदेशी ताक़तों का मोहरा' कहा था. ये भी कहा गया था कि भारत तोप ख़रीदकर ताक़तवर न हो जाए इसलिए विपक्ष के 'देश विरोधी' लोग मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं.
आज भी ऐसे ही सुर सुनाई दे रहे हैं. बीजेपी ने संयुक्त संसदीय जांच समिति के गठन से इनकार कर दिया है, ठीक ऐसा ही राजीव गांधी ने भी किया था, हालांकि बाद में उन्हें विपक्ष की इस मांग को मानना पड़ा था.
भारतीय वायु सेना की ज़रूरतों को देखते हुए, फ़्रांसीसी कंपनी डासो एविएशन से 126 विमान ख़रीदे जाने थे. 2012 से मनमोहन सिंह की सरकार से फ़्रांसीसी कंपनी की बातचीत चल रही थी, 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा. 2015 में डासो के प्रमुख एरिक ट्रेपिए ने कहा था कि "95 प्रतिशत बातें तय हो गई हैं और जल्दी ही काम शुरू होगा."
प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अप्रैल 2015 को अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान 17 समझौतों पर दस्तख़त किए, जिनमें एक समझौता रफ़ाल विमान की ख़रीद का भी था. फ्रांसीसी कंपनी से ख़रीदे जाने वाले विमानों की संख्या 126 से घटकर अचानक 36 हो गई. सरकार ने अभी तक देश की संसद या मीडिया को नहीं बताया है कि इतना बड़ा बदलाव, कब, क्यों और कैसे हुआ?
पहले न सिर्फ़ 126 फ़ाइटर जेट ख़रीदे जाने थे बल्कि उनमें से 108 विमान भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र करार के तहत, बेंगलुरू में सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (एचएएल) में बनाए जाने वाले थे लेकिन वह इरादा छोड़ दिया गया. सरकारी क्षेत्र की कंपनी एचएएल के पास लड़ाकू विमान बनाने का अच्छा-ख़ासा अनुभव है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र के तहत वहाँ पहले भी सैकड़ों जगुआर और सुखोई विमान बनाए गए हैं.
'मेक इन इंडिया' में रक्षा क्षेत्र पर ज़ोर देने की बात कही गई थी और यह उस दिशा में बहुत बड़ा कदम हो सकता था. लंबी प्रक्रिया को पूरा करके, वायु सेना की ज़रूरतों का आकलन करने के बाद ही तय किया गया था कि 126 विमानों की ज़रूरत होगी. क्या भारत की जनता को बताया नहीं जाना चाहिए कि वायु सेना की लड़ाकू विमानों की ज़रूरत कम कैसे हो गई और एचएएल को यह मौका क्यों नहीं दिया गया?

Monday, October 1, 2018

谢谢你,再见——北京煤电小史

年3月18日上午9:42,随着4号机值长刘勇按下停止键,北京市最后一座燃煤电厂——华能北京热电厂的所有燃煤机组实现停机。至此,北京市原有的四座燃煤电厂已全部关停,和几代北京人成长记忆密切相关的大型燃煤电厂将成为历史,彻底告别这个国家的首都。

自上世纪50年代随工业化起步,90年代在市场经济改革中不断改建重组,最终确立为四大煤电厂的供电供暖体系,到2010年代在环境压力下全部关停,北京的燃煤电厂见证了半个多世纪中国社会的沧桑巨变。
从1949年中华人民共和国成立到1950年代,刚刚执掌政权的中国共产党逐步提出了“工业现代化、农业现代化、国防现代化、科学技术现代化”的国家战略目标,“建设四个现代化”被写在工厂的车间、贴在宿舍的走廊、印在作业本的封面,以社会主义特有的宣传方式进入中国人的语言体系。

中国的年轻人或许对于提出这个目标的年代没有概念。在提出“建立一个独立的、比较完整的工业体系和国民经济体系,使工业大体接近世界先进水平”这样雄心勃勃的“初步”目标的时候,中国还是一个传统的农业国家,工业体系全无基础可言。

为建立工业化的初步基础,中国由1953年至1957年开始执行国民经济和社会发展第一个五年计划,其中,苏联等国援建的156项重工业项目是重点中的重点,“156项工程”被誉为新中国工业的奠基石。

这156项重点工程中唯一一个位于首都的,就是北京热电厂,后改制为国华北京热电厂。这是新中国成立后在北京建设的第一家高温高压热电联产企业,曾是北京市重要的集中供热热源和电力支撑点。国华热电厂总装机容量40万千瓦,供热能力2100万平方米,按照当时全国人均5平米左右的城市居民住房面积计算,相当于可以为400万人的住宅供暖。
经济发展的基本规律是电力先行。作为现代化的重要标志,电力供应是工业生产的基础,和城市化直接联系。

工业在“赶英超美”的口号下快速发展,北京城区的用电需求也连续多年持续增长,电力缺口日趋加大。根据后来北京市统计局和国家统计局公布的数据,北京地区1958年的年用电量为7.87亿千瓦时,而在1949年,这一数字仅为8245万千瓦时,10年的时间翻了近10倍。

在此背景下,石景山发电厂高井电站工程于1959年破土动工。15年后这座燃煤电站才在文革末期建成,总装机容量60万千瓦,供热面积1200万平方米,用于满足北京西部的用电和供热需求。


加上赶在1990年北京亚运会前改建完成的京能石景山热电厂,和文首提到的华能北京热电厂,最多有四座煤电厂同时在北京运行,为首都提供制暖和能源。