Monday, September 10, 2018

बैटरी वाली गाड़ी के ज़रिए जीविका तलाशतीं तीन महिलाएं

संतोषी मुंडा, जानकी कुमारी मुंडा और सुमन देवी रांची की सड़कों पर सरपट बैटरी रिक्शा (ई-रिक्शा) दौड़ाती हैं. यहां अब तक ये काम मर्दों का ही माना जाता था, लेकिन अब ये तीन महिलाएं भी इसमें अपनी किस्मत आज़मा रही हैं.
इसके पीछे तीनों की ज़रूरतों की अलग-अलग कहानियां हैं. लेकिन इन तीनों के सामने मुश्किलें कुछ एक-सी ही हैं- इन्हें अपने काम के कारण कई बार पुरुषों से भद्दे ताने सुनने पड़ते हैं.
ये तीनों ही इन तानों का जबाब देना पसंद नहीं करतीं. इनका कहना है कि उनके लिए कमाई करना ज़रूरी है ना कि किसी तरह के विवाद में पड़ना.
मैंने तीनों से यही सवाल किया ये बैटरी रिक्शा ही क्यों चलाती हैं, ऑटो भी तो चला सकती हैं? इस प्रश्न के उत्तर में उनके जवाब कुछ इस तरह के होते हैं.
"मैं किसी पर बोझ बनना नहीं चाहती. मेरे बच्चे का भविष्य भी तो मेरी जिम्मेदारी है, तो मुझे जो काम मिला वो करती हूं."इस महगांई में बच्चों की पढ़ाई और शहर में रहना और मकान का किराया देना आसान नहीं है. परिवार चलाना है तो कमाना पड़ेगा ही. जो ज़रिया मिला, उसे अपना लिया. अब कमाने वाला मर्द हो या औरत, क्या फर्क पड़ता है."
"कौन क्या कहता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कमाई होगी तभी तो खाना मिलेगा इसमें शर्म की या बात है."
सुमन देवी, जानकी कुमारी मुंडा और संतोषी मुंडा रोज़ाना बैटरी रिक्शा चलाकर 800 से 1,000 रुपये तक कमा लेती हैं. वो अपना रिक्शा मर्दों की रिक्शा के साथ ही कतारों लगाती हैं.
रांची जिला ई-रिक्शा चालक यूनियन के अध्यक्ष दिनेश सोनी कहते हैं, "फ़िलहाल रांची में यही तीन महिलाएं ही ई-रिक्शा चलाती हैं, लेकिन हम उम्मीद कर रहे हैं कि इन्हें देखकर और महिलाएं भी इस काम में आगे आएंगी."ल की संतोषी मुंडा और 27 साल की जानकी कुमारी मुंडा आदिवासी हैं. वो कहीं और से काम की तलाश में रांची आई थीं.
संतोषी रांची से चालीस किलोमीटर दूर सिल्ली की रहनेवाली हैं. वो सालों पहले रांची आ गई थीं और किराए पर मकान ले कर रहने लगीं.
संतोषी जब एक साल की थीं उनकी मां का देहांत हो गया था. इसके बाद उनके पिता घर छोड़ कर चले गए थे. उनके परिवार में अब उनके अलावा दो भाई और दो बहनें थीं जो उनसे बड़े थे. संतोषी के बड़े भाई सबको लेकर रांची आ गये और यहीं पर काम करने लगे.
वो कहती हैं कि मां के बाद पता नहीं पिताजी कहीं चले गए, उनका पता नहीं चल पाया.
"मेरी बड़ी दीदी बाई का काम करती थीं. आठ साल में मैं अपनी बड़ी दीदी के काम में हाथ बंटाने लगी और उनका साथ जाने लगी. मैं फुटबॉल खेलना चाहती थी लेकिन मेरे भाईयों ने मुझे दाई का काम सीख कर आगे वही काम करने की सलाह दी."
संतोषी मुंडा कहती हैं "मैंने भाई का घर छोड़ दिया और मेरी दीदी जहां काम करती थीं वहां काम करने लगी और उन्होंने मुझे रहने की जगह दी. बाद में कुछ दोस्तों से मदद मैंने पहले स्कूटी चलाई और उसके बाद ड्राइविंग सीखी."
"इसके बाद मैंने टैक्सी चलानी शुरू की और काफ़ी पैसे जमा किए ताकि मैं अपनी टैक्सी ख़रीद सकूं. जब ई-रिक्शा आया तो मुझे लगा कि मैं ये खरीद सकती हूं, लेकिन पैसे पूरे नहीं पड़े."
"फिर मैंने सोचा किराए पर ही गाड़ी लेकर चला लूं. सो मैंने 300 रुपये प्रतिदिन किराए पर ई-रक्शा किराए पर ले लिया. मैंने जिससे गाड़ी ली उसने मुझसे समय पर पैसे देने के लिए कहा औऱ गाड़ी दे दी."
बीते दो साल से संतोषी मुंडा बैटरी रिक्शा चला रही हैं. उनका कहना है कि वो हर महीने करीब 20 से 25 हज़ार रुपये तक इस काम से कमा लेती हैं जिसमें से गाड़ी का किराया और उनका खर्च आसानी से निकल जाता है.
जानकी मुंडा का गांव टाटी सिल्वा रांची से क़रीब 20 किलोमीटर दूर है. शादी के बाद वो अपने पति के घर रांची आ गईं.
उनके पति ऑटोरिक्शा चलाते हैं और यही परिवार की आय का एकमात्र ज़रिया है. लेकिन एक बेटी और एक बेटा होने के बाद उनके लिए घर चलाना मुश्किल हो रहा था. बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना और घर का किराया देना संभव नहीं था.
अपनी जमा पूंजी जोड़ कर और दोस्तों से उधार लेकर उन्होंने एक बैटरी रिक्शा खरीदा और सोचा कि इसे किराए पर लगा देंगे.
लेकिन बैटरी रिक्शा किराए पर लेने के लिए कोई सामने नहीं आया और वो ऐसे ही पड़ी रही. इसके बाद जानकी ने फ़ैसला किया कि वो इसे ख़ुद चलाएंगी.
जानकी कहती हैं, "मेरा बेटा प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता है और बेटी भी प्राइवेट स्कू्ल में है. उनकी फ़ीस, घर का किराया और राशन सभी इसी की कमाई से पूरा हो पाता है." साल की सुमन देवी अपने पति के निधन के बाद वापिस अपने मायके लौट आईं जो रांची के हीनू में है. उनके साथ उनका बेटा था और वो नहीं चाहती थीं कि वो अपने परिवार के लिए बोझ बनें.
सुमन कहती हैं, "मेरा बेटा छह महीने का था जब मेरे पति इस दुनिया से चले गए. जब मेरा बच्चा जब पांच साल का हुआ तो मैं उसका एडमिशन प्राइवेट स्कूल में कराना चाहती थी. लेकिन इसके लिए मुझे काफी परेशान होना पड़ा. तभी मैंने सोच लिया था कि मुझे काम करना शुरू करना पड़ेगा.
"मैंने रांची में एक लेडीज़ गारमेंट्स की दुकान में आठ साल काम किया और पैसा जमा किया. मुझे कम से कम रहने के लिए एक छत मिली थी तो मैं पैसा समा कर सकती थी."
"फिर मैंने देखा कि बैटरी रिक्शा चला कर अपना खुद का काम कर सकती हूं. इसके बाद मैंने रिक्शा चलाना सीखा और रिक्शा खरीद कर खुद उसे चलाने लगी. पिछले छह महीने से बैटरी रिक्शा चला रही हूं."
सुमन कहती हैं कि वो इस काम से रोज़ाना लगभग 800 रुपये कमा लेती हैं. सुमन अपने बेटे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती हैं और उसे इंजीनियर बनाना चाहती हैं.

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